शेखावाटी की मिट्टी में केवल बाजरा नहीं उगता, यहाँ की कोख से ऐसे शूरवीर जन्म लेते हैं जिनके लहू की गर्मी से आज भी दुश्मन कांप उठते हैं। आज हम बात कर रहे हैं झुंझुनूं जिले के बेरी गाँव के उस महान सपूत की, जिसने मौत को सामने देखकर भी पीठ नहीं दिखाई। वह नाम है— कंपनी हवलदार मेजर पीरू सिंह शेखावत, जिन्हें देश के सर्वोच्च सैन्य सम्मान 'परमवीर चक्र' से (मरणोपरांत) नवाजा गया।
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| मेजर पीरू सिंह |
बचपन की वो बगावत और निडरता
20 मई 1918 को बेरी गाँव के एक संपन्न किसान परिवार में पीरू सिंह का जन्म हुआ। सात भाई-बहनों में सबसे छोटे पीरू सिंह बचपन से ही आम बच्चों से अलग थे। महज़ 7 साल की उम्र में जब उन्हें स्कूल भेजा गया, तो एक दिन किसी बात पर मास्टर जी ने उन्हें डांट लगा दी। स्वाभिमानी पीरू सिंह ने उसी वक्त अपनी स्लेट ज़मीन पर पटकी और स्कूल से निलक गए, तो फिर कभी पलटकर स्कूल का दरवाज़ा नहीं देखा।
किताबों से दूर पीरू सिंह का मन अब खेतों की हरियाली के रोमांच में लगने लगा। पिता के साथ खेती में हाथ बंटाते हुए उन्हें शिकार का ऐसा शौक चढ़ा कि कई बार घायल होने के बावजूद उनके कदम कभी पीछे नहीं हटे। यही निडरता आगे चलकर उनके फौजी जीवन की सबसे बड़ी ताकत बनी।
सेना की वर्दी और एक अनोखा बदलाव
शिकार के इसी रोमांच ने उन्हें सेना की ओर खींचा और 1936 में उन्होंने 10/1st पंजाब रेजिमेंट में कदम रखा। फौज में जाते ही इस 'स्कूल से भागे हुए लड़के' के जीवन में एक चमत्कारिक बदलाव आया। जो लड़का बचपन में किताबों से दूर भागता था, उसी ने फौज की सख्त ट्रेनिंग के बीच पढ़ाई में ऐसी गंभीरता दिखाई कि कुछ ही सालों में 'इंडियन आर्मी फर्स्ट क्लास सर्टिफिकेट ऑफ़ एजुकेशन' हासिल कर लिया। उनकी इसी लगन और नेतृत्व क्षमता को देखते हुए उन्हें लांस नायक, नायक और फिर 1943 में 'कंपनी हवलदार मेजर' के पद तक पदोन्नत किया गया।
1948 का कश्मीर युद्ध और 'दारापारी' का वो खूनी मोर्चा
देश आज़ाद हो चुका था, लेकिन 1947-48 में पाकिस्तान ने धोखे से कश्मीर पर हमला कर दिया। महाराजा हरि सिंह की गुहार पर भारतीय सेना कश्मीर को बचाने निकल पड़ी। 18 जुलाई 1948 का वो दिन था। उत्तरी तिथवाल सेक्टर की दारापारी पहाड़ी पर पाकिस्तानी सेना मीडियम मशीनगनें और भारी गोला-बारूद लेकर छिप कर बैठी थी।
पीरू सिंह अपनी 'डी' कंपनी के साथ अग्रिम पंक्ति में थे। पहाड़ी पर चढ़ाई शुरू होते ही ऊपर से मौत की बारिश होने लगी। दुश्मन के ग्रेनेड और गोलियों से पीरू सिंह की आधी से ज़्यादा टुकड़ी पल भर में तबाह हो गई।
अकेले ही काल बन गए पीरू सिंहचारों तरफ अपने साथियों के गिरते शव और हवा में तैरती बारूद की गंध के बीच पीरू सिंह का खून खौल उठा। उन्होंने एक ज़ोरदार युद्धनाद किया और बचे हुए साथियों का हौसला बढ़ाते हुए सीधे दुश्मन की पहली मशीनगन पोस्ट की ओर दौड़ पड़े।
गोलियों और ग्रेनेड के छर्रे उनके शरीर को चीरते हुए निकल रहे थे। पूरा शरीर लहूलुहान था, वर्दी खून से लाल हो चुकी थी, लेकिन झुंझुनूं का यह लाल रुकने वाला कहाँ था! उन्होंने अपनी परवाह किए बिना दुश्मन के बंकर में छलांग लगा दी और अपनी संगीन (Bayonet) से दुश्मनों को गाजर-मूली की तरह काट डाला।
आखिरी सांस और दुश्मन का खात्मा
पहली पोस्ट तबाह करने के बाद जब पीरू सिंह ने पीछे मुड़कर देखा, तो पाया कि अब वो बिल्कुल अकेले बचे हैं। उनके सभी साथी या तो शहीद हो गए थे या बुरी तरह घायल थे। इसी बीच एक ग्रेनेड सीधा उनके चेहरे पर आकर फटा। उनकी आँखें और चेहरा खून से सन गया। दिखाई देना लगभग बंद हो चुका था।
कोई और होता तो वहीं गिर पड़ता, लेकिन वो पीरू सिंह थे। उन्होंने खून से सनी आँखों के साथ ही रेंगते हुए दुश्मन की दूसरी खाई की ओर कूच किया और वहां भी घुसकर दो दुश्मनों को मौत के घाट उतार दिया।
सांसें उखड़ने लगी थीं, लेकिन उन्होंने पास ही मौजूद तीसरे बंकर को भी नेस्तनाबूद करने की ठान ली। जैसे ही वे तीसरे बंकर की तरफ बढ़े, दुश्मन की एक गोली सीधे उनके सिर में आ लगी। पीरू सिंह गिर पड़े, लेकिन गिरने से ठीक पहले उनके हाथ से छूटा ग्रेनेड दुश्मन के तीसरे बंकर में जा गिरा। एक ज़ोरदार धमाका हुआ और दुश्मन का तीसरा बंकर भी हमेशा के लिए खामोश हो गया।
उसी धमाके की गूंज के साथ 18 जुलाई 1948 को झुंझुनूं के इस शेर ने भारत माता की गोद में हमेशा के लिए आँखें मूंद लीं।
अकेले दम पर दुश्मन की कमर तोड़ने वाले इस अदम्य साहस और सर्वोच्च बलिदान के लिए 1952 में उन्हें मरणोपरांत 'परमवीर चक्र' से सम्मानित किया गया। 'झलको झुंझुनूं' की पूरी टीम इस महान योद्धा के चरणों में नमन करती है।
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